बस कुछ दिन और फिर हमारी भी छुट्टियां लग जाएंगी, ये सोचकर मैं मन ही मन कितना खुश हो रहा था, तभी लंच का टाइम हो गया। सभी क्लास के बच्चे बाहर आ गए थे। हमारे पास में ही एक ही लाइन में तीन क्लासे थीं और क्लास के सामने दो गहरे पूल बने हुए थे, जिनमें मेरे जैसा 5.8 फीट का इंसान तो पूरी तरह से डूब सकता था। दोनों पूलों के बीच दूसरी तरफ जाने का रास्ता था और उस तरफ भी वैसे ही तीन क्लासे थीं। ये सब स्कूल के पीछे का एक आंगन था और प्रिंसिपल जी का रूम आगे की ओर था। हमारी भी लंच करने की तैयारी थी, लेकिन आज प्रिंसिपल सर ने कहा था कि आज वो लंच में आएंगे, उन्हें हमें भविष्य के बारे में हमारा मार्गदर्शन करना था। मैं पीछे से दो पंक्ति आगे और आगे से तीन पंक्तियों के पीछे बैठा हुआ था। कक्षा में दो गेट, एक आगे और एक पीछे तथा दोनों तरफ दो खिड़कियां बनी हुई थीं। मेरी सीट खिड़की के पास ही थी तो मैं बाहर का दृश्य नहीं देख सकता था, किंतु जब भी बाहर से चिल्लाने की आवाजें आती या लगता कि बाहर देखना चाहिए तो अपनी सीट से उठकर, आगे की ओर झुककर देख लिया करता था। अब कुछ ही समय बाद सर भी आ गए। सफेद रंग की प्लेन ...
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