पता नहीं क्यों, लेकिन आज भी मुझे इंतज़ार रहता है।
मैंने कितनी ही बार कोशिश की कि इन सब चीज़ों से पीछा छुड़ा लूँ। हर बार खुद से कहा कि अब नहीं सोचूँगा, अब किसी के बारे में इतना नहीं उलझूँगा। लेकिन फिर भी मैं वापस आकर उसी जगह फँस जाता हूँ। कभी-कभी लगता है कि क्या ये सब प्रकृति (nature) खुद तय कर रही है? या फिर मेरा मन और मेरा हृदय मुझे नियंत्रित (control) कर रहे हैं?
मैं हर बार सोचता हूँ कि मुझे ये सब नहीं करना, किसी के बारे में इतना नहीं सोचना, लेकिन फिर अनजाने में वही करने लगता हूँ जो नहीं करना चाहता। आप शायद सोच रहे होंगे कि मैं किस बात की बात कर रहा हूँ।
मैं बात कर रहा हूँ प्रेम करने की। किसी को अपना दिल दे देने की। अपनी आत्मा तक किसी को समर्पित कर देने की। लेकिन समय के साथ मुझे समझ आया कि शायद मैं प्रेम से ज़्यादा अपनी ही बनाई हुई कहानियों से प्रेम करता था।
प्रेम की पहली अवस्था – जब सिर्फ दिल काम करता है
कितना अजीब होता है न?
हम हमेशा उस इंसान के पीछे पागल हो जाते हैं जिसे हम चाहते हैं। उसके लिए सब कुछ करने को तैयार हो जाते हैं। उस वक़्त लगता है कि अगर यह इंसान मिल गया, तो मैं दुनिया का सबसे भाग्यशाली इंसान हो जाऊँगा।
हम इतना प्रेम में डूब जाते हैं कि पूरा दिन उसके साथ बिता सकते हैं। उसकी बातें सुन सकते हैं। उसकी छोटी सी खुशी के लिए कुछ भी कर सकते हैं। कभी-कभी वह हमें नज़रअंदाज़ भी करे, फिर भी उसके पास रहने भर से इतनी खुशी मिलती है जितनी किसी और चीज़ में नहीं मिलती। यह प्रेम की प्रारंभिक अवस्था होती है, इस वक़्त सिर्फ दिल सक्रिय होता है। सोचने-समझने की शक्ति लगभग खत्म हो जाती है। हमें लगता है कि जो भी हम कर रहे हैं, सही कर रहे हैं। और धीरे-धीरे हम यह मान लेते हैं कि सामने वाला भी हमारे लिए उतना ही पागल है जितना हम उसके लिए हैं।
दूसरी अवस्था – जब दिल के साथ दिमाग भी कहानियाँ बनाने लगता है
अब हम ज़्यादा बातें करते हैं। अपने रहस्य साझा करते हैं। उसकी हर बात में छिपा हुआ अर्थ ढूँढने लगते हैं। उसके पास बैठने के बहाने ढूँढते हैं। उसका दैनिक रूटीन तक याद हो जाता है। उसकी एक मुस्कान पूरा दिन बना देती है और उसका नज़रअंदाज़ करना पूरा दिन खराब कर देता है। लेकिन इसी अवस्था में एक और चीज़ जन्म लेती है – शक। जब वह किसी और से बात करता है तो मन में सवाल उठते हैं।
यह कौन है? यह किस बात पर हँस रहे हैं? क्या मैं ही बेवकूफ हूँ जो इतना सोच रहा हूँ? और धीरे-धीरे हम ध्यान (attention) के भूखे हो जाते हैं। हमें उसकी हर नज़र चाहिए होती है। हर प्रतिक्रिया चाहिए होती है। हर वक़्त पुष्टि (confirmation) चाहिए होती है कि वह भी हमें उतना ही पसंद करता है जितना हम उसे करते हैं।
तीसरी अवस्था – जब इंसान आदत बन जाता है
समय के साथ वह इंसान हमारी आदत बन जाता है। हम सोशल मीडिया पर ऐसी पोस्ट डालते हैं जो सिर्फ वह समझ सके। हम भविष्य के दृश्य (scenes) कल्पना करते हैं। हम अपने मन में पूरी कहानियाँ लिख देते हैं।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल वही रहता है— "क्या मुझे इज़हार कर देना चाहिए?" और इसी सवाल का जवाब कभी नहीं मिलता। मित्रता टूट जाने का डर हमें रोक लेता है। हम चुप रहते हैं, समय निकलता रहता है। और फिर एक दिन हम देखते हैं कि वह इंसान किसी और के साथ खुश है। उसकी ज़िंदगी बहुत अच्छी चल रही है। और हम वहीं खड़े हैं जहाँ पहले थे। उस वक़्त लगता है कि हमें धोखा मिला है। लेकिन सच में धोखा किसने दिया? उस इंसान ने? या हमारी उम्मीदों ने?
मेरे साथ ऐसा बहुत बार हुआ। हर बार किसी को पसंद किया। हर बार वह आदत बना। हर बार लगाव हुआ। हर बार वासना भी आई। और हर बार बिना कुछ कहे सब खत्म हो गया। उस समय मुझे लगता था कि मुझे प्रेम में हार मिली है। लेकिन आज लगता है कि मैं प्रेम में नहीं हारा था। मैं अपने ही मन की बनाई हुई दुनिया में जी रहा था। मुझे उन लोगों से ज़्यादा उनके साथ जुड़ी हुई कहानियाँ पसंद थीं।
सबसे बड़ी अनुभूति,
मुझे समझ आया कि ज़रूरी नहीं हर आकर्षण प्रेम हो। कई बार वह अकेलापन होता है। कई बार भावनात्मक लगाव होता है। कई बार कल्पना होती है। और कई बार वासना भी होती है। मुझे समझ आया कि मैं बार-बार एक ही गलती कर रहा था। मैं लोगों को देखने के बजाय उनके बारे में कहानियाँ बना रहा था। और जब वास्तविकता उन कहानियों जैसी नहीं निकली, तो दिल टूट गया।
एक चौथी अवस्था भी होती है।
पहली आकर्षण की, दूसरी लगाव की, तीसरी दिल टूटने की, और चौथी जागरूकता की। जब इंसान समझता है कि उसके दर्द का बड़ा हिस्सा सामने वाले ने नहीं, बल्कि उसकी अपनी उम्मीदों ने दिया था। मुझे लगता है कि मैं आज उसी अवस्था में हूँ। आज मुझे लगता है कि अच्छा हुआ मैंने कभी इज़हार नहीं किया।
हो सकता है अगर करता तो मित्रता भी खत्म हो जाती। मैं अवसाद (depression) में गया, मैं रोया, मैं टूट गया। लेकिन मैंने खुद को अकेला नहीं छोड़ा। मैं अपने लोगों के पास गया। उनसे बात की, दिल हल्का किया। और धीरे-धीरे समझा कि जब हम दुखी होते हैं तब हमें लोगों की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है। लेकिन हम उल्टा करते हैं। हम दुनिया से दूर चले जाते हैं। और जब हम खुश होते हैं तब सबको बताते फिरते हैं।
शायद हमें इसका उल्टा करना चाहिए। जब दुख हो तब लोगों के पास जाना चाहिए। और जब बहुत ज़्यादा खुशी हो तब कुछ देर अकेले बैठकर उस खुशी को महसूस करना चाहिए। क्योंकि असली सुकून वहीं मिलता है। और शायद प्रेम भी।
प्रेम तब मिलता है जब हम उसे माँगना छोड़ देते हैं। जब हम उसे पकड़ने की कोशिश नहीं करते। सिर्फ महसूस करते हैं। और तब समझ आता है कि प्रेम से भी ज़्यादा ज़रूरी चीज़ होती है — सम्मान। और मेरी ज़िंदगी में हमेशा प्रेम से पहले सम्मान की जगह रही।
मैंने शुरुआत में कहा था कि मुझे आज भी इंतज़ार रहता है, लेकिन अब मुझे समझ आ गया है कि वह इंतज़ार किसी और का नहीं था। मैं तो शायद हमेशा से अपना ही इंतज़ार कर रहा था। इन सब अनुभवों के बाद आखिरकार मुझे वह मिल गया, जिसे मैं इतने सालों से ढूँढ रहा था। और वह कोई दूसरा इंसान नहीं, बल्कि मैं खुद था। शायद हर अधूरी कहानी का मक़सद किसी और को पाना नहीं, बल्कि खुद को ढूँढना होता है।