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राजस्थान का इतिहास — RPSC RAS Mains
प्रागैतिहासिक काल से 18वीं सदी के अवसान तक: युगांतकारी घटनाएँ, प्रमुख राजवंश एवं प्रशासनिक-राजस्व व्यवस्था
1. प्रागैतिहासिक काल का राजस्थान
1.1 पाषाण काल (Stone Age)
- पुरापाषाण काल (Paleolithic): चम्बल घाटी (कोटा-भरतपुर), डीडवाना, बेराछ नदी घाटी — हस्त कुठार (Hand-axe), स्क्रेपर आदि उपकरण मिले।
- मध्यपाषाण काल (Mesolithic): बागोर (भीलवाड़ा, कोठारी नदी तट) — सबसे बड़ा मध्यपाषाणकालीन स्थल, यहाँ से माइक्रोलिथ्स (लघु पाषाण उपकरण) एवं पशुपालन के प्रमाण मिले। साथ ही तिलवाड़ा (बालोतरा, लूनी नदी) भी महत्वपूर्ण स्थल है।
- नवपाषाण काल (Neolithic): गणेश्वर (सीकर, कांतली नदी) — 'ताम्रयुगीन सभ्यता का पिता' कहा जाता है; यहाँ ताम्र (तांबे) के औजार सर्वाधिक मात्रा में मिले हैं (सिंधु सभ्यता से पूर्व)।
1.2 ताम्र-पाषाण काल (Chalcolithic) — आहड़/बनास सभ्यता
- आहड़ सभ्यता (उदयपुर, आहड़ नदी) — 'ताम्रवती नगरी' कहलाती है; यहाँ के लोग ताम्बे के औजार व मिट्टी के काले-लाल मृदभांड (Black and Red Ware) बनाते थे।
- बनास सभ्यता की प्रमुख शाखाएँ/स्थल: गिलुण्ड (राजसमंद), ओझियाना (भीलवाड़ा), बालाथल (उदयपुर)।
- कालीबंगा (हनुमानगढ़, घग्घर नदी) — सिंधु घाटी सभ्यता का स्थल; विश्व का सबसे प्राचीन जुते हुए खेत (Ploughed Field) के प्रमाण यहीं से मिले; भूकंप के प्रमाण भी मिले हैं।
परीक्षा दृष्टि: स्थल → नदी → विशेषता का त्रिकोण (जैसे बागोर-कोठारी-माइक्रोलिथ्स) बार-बार रटें, प्रीलिम्स व मुख्य परीक्षा दोनों में पूछा जाता है।
2. प्रमुख राजवंश एवं युगांतकारी घटनाएँ
2.1 गुर्जर-प्रतिहार वंश (6वीं – 12वीं शताब्दी)
- संस्थापक: नागभट्ट प्रथम (मूल शाखा — मंडोर/जोधपुर)।
- सर्वाधिक शक्तिशाली शासक: मिहिरभोज (भोज प्रथम) — 'आदिवराह' उपाधि, चांदी के सिक्कों पर वराह अंकित।
- हर्षवर्धन (आहड़, नाडौल शाखा) एवं वत्सराज (उज्जैन शाखा) भी प्रमुख शासक थे।
2.2 चौहान वंश (सांभर/अजमेर, शाकंभरी)
- संस्थापक: वासुदेव चौहान (शाकंभरी शाखा)।
- पृथ्वीराज तृतीय: तराइन का प्रथम युद्ध (1191 ई.) — मोहम्मद गौरी को पराजित किया; तराइन का द्वितीय युद्ध (1192 ई.) — गौरी से पराजित एवं मृत्यु — चौहान साम्राज्य का पतन।
- रणथम्भौर के चौहान — हम्मीरदेव चौहान: अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध (1301 ई.) में पराजित, 'साके' की परंपरा (केसरिया व साका)।
2.3 परमार वंश (मालवा/आबू क्षेत्र)
- संस्थापक: उपेन्द्रराज/कृष्णराज।
- आबू शाखा प्रसिद्ध — दिलवाड़ा के जैन मंदिर (विमलशाही व लूणवसाही मंदिर) इसी क्षेत्र से सम्बंधित हैं।
2.4 गुहिल (सिसोदिया) वंश — मेवाड़
- संस्थापक: गुहिल (गुहादित्य), राजधानी: नागदा → चित्तौड़ → उदयपुर।
- रावल रतनसिंह: अलाउद्दीन खिलजी द्वारा चित्तौड़ पर प्रथम साका (1303 ई.) — पद्मिनी की कथा इसी से जुड़ी है।
- राणा कुम्भा (1433–1468 ई.): कुम्भलगढ़ दुर्ग, चित्तौड़ में विजय स्तम्भ एवं कीर्ति स्तम्भ का निर्माण; संगीत/स्थापत्य के महान संरक्षक।
- राणा सांगा (संग्राम सिंह): खानवा का युद्ध (1527 ई.) — बाबर से पराजित।
- राणा उदयसिंह: उदयपुर की स्थापना (1559 ई.)।
- महाराणा प्रताप: हल्दीघाटी का युद्ध (18 जून 1576 ई.) — मानसिंह (मुगल सेनापति) से युद्ध, चेतक घोड़े की प्रसिद्ध कथा; दिवेर का युद्ध (1582 ई.) में मुगलों को निर्णायक पराजय दी — इसे 'मेवाड़ की थर्मोपल्ली' भी कहा जाता है।
- अमरसिंह प्रथम: मुगलों (जहांगीर) से 1615 ई. में संधि — मेवाड़ की मुगल अधीनता स्वीकार, किंतु व्यक्तिगत रूप से दरबार में उपस्थित होने से मुक्त।
2.5 कछवाहा वंश — आमेर/जयपुर
- संस्थापक: दुल्हराय, राजधानी: आमेर → जयपुर (1727 ई. में सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा स्थापित)।
- राजा भारमल: अकबर से सर्वप्रथम वैवाहिक संबंध व मैत्री संधि स्थापित करने वाला राजपूत शासक (1562 ई.)।
- मानसिंह प्रथम: अकबर का प्रमुख सेनापति, हल्दीघाटी युद्ध का नेतृत्व, नवरत्नों में शामिल।
- सवाई जयसिंह द्वितीय: जयपुर नगर की स्थापना (1727 ई.), जंतर-मंतर वेधशालाओं का निर्माण (जयपुर, दिल्ली, उज्जैन, वाराणसी, मथुरा)।
2.6 राठौड़ वंश — मारवाड़ (जोधपुर)
- संस्थापक (मारवाड़ शाखा): राव सीहा/राव चूण्डा; राव जोधा — जोधपुर नगर की स्थापना (1459 ई.)।
- राव मालदेव: गिरी सुमेल का युद्ध (1544 ई.) — शेरशाह सूरी से युद्ध; मारवाड़ का सर्वाधिक विस्तार इसी शासक के काल में।
- राव चन्द्रसेन: 'मारवाड़ के प्रताप' कहे जाते हैं — मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं की।
- महाराजा अजीतसिंह: 'मारवाड़ की स्वतंत्रता संग्राम' के नायक — औरंगजेब के विरुद्ध दुर्गादास राठौड़ के संरक्षण में संघर्ष कर मारवाड़ पुनः प्राप्त किया।
- दुर्गादास राठौड़: मारवाड़ के 'भीष्म पितामह' कहे जाते हैं।
2.7 भाटी वंश — जैसलमेर
- संस्थापक: राव जैसल — जैसलमेर की स्थापना (1156 ई.); पूर्व राजधानी लोद्रवा थी।
- जैसलमेर व्यापारिक मार्ग (मध्य एशिया) पर स्थित होने से समृद्ध रहा; अनेक साके यहाँ हुए — जैसे रावल जैतसिंह के समय अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण में।
2.8 हाड़ा चौहान — बूंदी व कोटा
- संस्थापक (बूंदी): राव देवा — बूंदी की स्थापना; कोटा बाद में बूंदी से अलग होकर स्वतंत्र रियासत बना (राव माधोसिंह के समय, शाहजहां द्वारा 1631 ई. में मान्यता)।
3. कालानुक्रमिक युगांतकारी घटनाएँ — त्वरित पुनरावृत्ति
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1191 ई. | तराइन का प्रथम युद्ध — पृथ्वीराज चौहान की विजय |
| 1192 ई. | तराइन का द्वितीय युद्ध — मोहम्मद गौरी की विजय, चौहान साम्राज्य का अंत |
| 1301 ई. | रणथम्भौर विजय — हम्मीरदेव चौहान की पराजय |
| 1303 ई. | चित्तौड़ पर अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण — प्रथम साका |
| 1433–68 ई. | राणा कुम्भा का शासनकाल — कुम्भलगढ़, कीर्ति स्तम्भ, विजय स्तम्भ |
| 1459 ई. | राव जोधा द्वारा जोधपुर की स्थापना |
| 1527 ई. | खानवा का युद्ध — राणा सांगा बनाम बाबर |
| 1544 ई. | गिरी सुमेल का युद्ध — राव मालदेव बनाम शेरशाह सूरी |
| 1559 ई. | उदयपुर की स्थापना — राणा उदयसिंह |
| 1562 ई. | आमेर-मुगल वैवाहिक संधि — राजा भारमल व अकबर |
| 1576 ई. | हल्दीघाटी का युद्ध — महाराणा प्रताप बनाम मानसिंह (अकबर) |
| 1582 ई. | दिवेर का युद्ध — महाराणा प्रताप की निर्णायक विजय |
| 1615 ई. | मेवाड़-मुगल संधि — अमरसिंह प्रथम व जहांगीर |
| 1631 ई. | कोटा को स्वतंत्र रियासत की मान्यता (शाहजहां द्वारा) |
| 1679–1707 ई. | मारवाड़ की स्वतंत्रता संघर्ष — दुर्गादास राठौड़ व अजीतसिंह बनाम औरंगजेब |
| 1727 ई. | जयपुर नगर की स्थापना — सवाई जयसिंह द्वितीय |
4. मध्यकालीन राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था
4.1 सामंती व्यवस्था — मूल स्वरूप
- मध्यकालीन राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था 'सामंतवाद' पर आधारित थी — राजा व सामंतों के मध्य पारस्परिक कर्तव्य व सैन्य सहयोग का संबंध।
- कर्नल जेम्स टॉड ने मेवाड़ की सामंती व्यवस्था की तुलना यूरोप की सामंती व्यवस्था से की — किंतु यूरोप में स्वामी-सेवक संबंध था जबकि राजस्थान में यह भाईचारे/बंधुत्व (Kinship) पर आधारित अपेक्षाकृत समानता का संबंध था।
- मुगल मनसबदारी व्यवस्था को 'सीढ़ीनुमा' (केंद्रीकृत, पदानुक्रमिक) कहा गया, जबकि राजस्थान की सामंती व्यवस्था को 'टैंट' (तम्बू) के समान बताया गया — जिसका केंद्र बिंदु राजा होता था और सामंत रस्सियों की भांति उसे संभाले रहते थे।
4.2 सामंतों का वर्गीकरण (मेवाड़ के संदर्भ में)
| वर्ग | विवरण |
|---|---|
| सोलह उमराव (16 ठिकाने) | मेवाड़ के प्रमुख/बड़े सामंत — जैसे सलूम्बर, बदनोर, आमेट, बेगूं आदि |
| सामान्य सामंत | मझले दर्जे के जागीरदार |
| गोल के सामंत | छोटे सामंत, जो सामूहिक रूप से एक साथ दरबार में उपस्थित होते थे |
4.3 प्रशासनिक इकाइयाँ व पदाधिकारी
| इकाई/पद | कार्य/विवरण |
|---|---|
| परगना | जिले के समान प्रशासनिक इकाई; प्रमुख अधिकारी — हाकिम/आमिल |
| गाँव (मौजा) | सबसे छोटी प्रशासनिक इकाई; पटवारी (लेखा-जोखा), पंचायत द्वारा संचालन |
| कोतवाल | नगर की सुरक्षा व कानून-व्यवस्था |
| फौजदार | सैन्य व कानून व्यवस्था (जिला स्तर) |
| बक्शी | सैन्य वेतन एवं लेखा व्यवस्था |
| पोतदार | राजकोष/खजाने का अधिकारी |
| कारखाना | राज्य के विभिन्न विभाग (टकसाल, अस्तबल आदि) — दरीखाना, तोषाखाना आदि इसके अंतर्गत |
5. मध्यकालीन राजस्थान की राजस्व व्यवस्था
5.1 भूमि का वर्गीकरण (स्वामित्व के आधार पर)
| भूमि प्रकार | विवरण |
|---|---|
| खालसा भूमि | राज्य/राजा के सीधे नियंत्रण व राजस्व वसूली की भूमि |
| जागीर भूमि | सैन्य सेवा के बदले सामंतों को दी गई भूमि; जागीरदार वहाँ का राजस्व स्वयं वसूलता था |
| भोम भूमि | विशेष सैन्य/सुरक्षा सेवा (चौकीदारी) के बदले भोमियों को दी गई भूमि — प्रायः कर-मुक्त या न्यून कर |
| सासन/शासन भूमि | ब्राह्मणों, चारणों, मंदिरों आदि को दान स्वरूप दी गई कर-मुक्त भूमि |
| पावता भूमि | राजा द्वारा किसी विशेष उपलक्ष्य में दी गई भूमि |
5.2 भूमि माप की इकाइयाँ
- बीघा — सबसे प्रचलित माप इकाई (क्षेत्रानुसार भिन्न-भिन्न आकार)।
- विश्वा — बीघे का उपविभाजन (1 बीघा = 20 विश्वा, सामान्यतः)।
- मुरब्बा/पावता जैसे स्थानीय शब्द भी क्षेत्र विशेष में प्रचलित थे।
5.3 भू-राजस्व निर्धारण की पद्धतियाँ
- बटाई (गल्ला बख्शी): उपज का निर्धारित हिस्सा (प्रायः आधा) राजस्व के रूप में — फसल कटाई के समय बंटवारा।
- कुंता/जिन्सी: पैदावार का अनुमान लगाकर राजस्व निर्धारण।
- ठेका (मुक़ाता) पद्धति: निश्चित नकद राशि सामूहिक रूप से गाँव/परगना से वसूली।
- चकबंदी/जमाबंदी: भूमि व राजस्व का लिखित लेखा-जोखा — पटवारी द्वारा संधारित।
5.4 अन्य कर व लाग-बाग (उपकर)
| कर/लाग का नाम | विवरण |
|---|---|
| चंवरी | विवाह के अवसर पर वसूला जाने वाला कर |
| तलवार बंधाई | नए शासक के राज्याभिषेक के अवसर पर सामंतों से ली जाने वाली भेंट |
| डाली | त्योहारों/उत्सवों पर भेंट स्वरूप दिया जाने वाला कर |
| चराई | पशुचारण पर लगाया गया कर |
| सायर | व्यापार/माल के आवागमन पर लगाया गया चुंगी कर |
| लाग-बाग | विभिन्न सामाजिक अवसरों (जन्म, मृत्यु, विवाह आदि) पर वसूले जाने वाले लघु कर — सामूहिक नाम |
परीक्षा दृष्टि: राजस्व से जुड़े शब्दों (चंवरी, तलवार बंधाई, बटाई, कुंता आदि) की परिभाषा एक-दो पंक्ति में स्पष्ट व सटीक याद रखें — मुख्य परीक्षा में शब्द बताकर व्याख्या पूछी जाती है।
6. मुख्य परीक्षा (Mains) हेतु संभावित प्रश्न
- मध्यकालीन राजस्थान की सामंती व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ बताते हुए इसकी तुलना यूरोप की सामंती व्यवस्था से कीजिए।
- राजस्थान के प्रागैतिहासिक स्थलों (बागोर, गणेश्वर, आहड़, कालीबंगा) के सांस्कृतिक महत्व की विवेचना कीजिए।
- महाराणा प्रताप के मुगल प्रतिरोध का ऐतिहासिक मूल्यांकन कीजिए।
- मध्यकालीन राजस्थान की भू-राजस्व व्यवस्था के प्रमुख स्वरूपों की विवेचना कीजिए।
- मारवाड़ की स्वतंत्रता संघर्ष में दुर्गादास राठौड़ की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।



