((वास्तविक जीवन के अनुभवों पर आधारित)
रक्षाबंधन के अगले दिन की शाम थी। रविवार होने के कारण भीड़ सामान्य दिनों से कहीं अधिक थी। मैं अपने शहर से घर लौटने के लिए लोकल ट्रेन में बैठा था। ट्रेन अभी स्टेशन पर ही खड़ी थी और धीरे-धीरे यात्रियों से भर रही थी।
मेरे सामने वाली सीट पर एक परिवार बैठा था। दो महिलाएँ मेरे पास वाली सीट पर थीं और एक महिला अपने लगभग आठ वर्ष के बेटे के साथ सामने बैठी थी। उनके परिवार के कुछ अन्य सदस्य भी आसपास ही बैठे हुए थे।
जैसे-जैसे भीड़ बढ़ती गई, ट्रेन पूरी तरह भर गई। सामने वाली सीट पर बच्चे के कारण थोड़ी जगह बची हुई थी जहाँ एक व्यक्ति आराम से बैठ सकता था। कई यात्री आकर पूछते कि क्या थोड़ा बैठने की जगह मिल सकती है, लेकिन हर बार जवाब मिलता, "बच्चे की तबीयत ठीक नहीं है।"
यह सुनकर मुझे थोड़ा अजीब लगा, लेकिन मैं केवल एक दर्शक था।
अगले स्टेशन पर कुछ लोग उतरे और उससे अधिक लोग चढ़ गए। तभी एक महिला अपने लगभग बारह वर्ष की बेटी और आठ वर्ष के बेटे के साथ हमारे डिब्बे में आई। भीड़ के कारण वे वहीं खड़े हो गए जहाँ हम बैठे थे।
महिला ने विनम्रता से बैठने की जगह माँगी, लेकिन उसे मना कर दिया गया। बात धीरे-धीरे बहस में बदल गई। कुछ ही मिनटों में आवाज़ें ऊँची होने लगीं। बहस बढ़ी तो सामने बैठे परिवार के अन्य सदस्य भी वहाँ आ गए और सब मिलकर उस अकेली महिला से बहस करने लगे।
पूरा डिब्बा अब उसी दृश्य को देख रहा था।
उस महिला के साथ केवल उसके दो छोटे बच्चे थे। उसकी तरफ से बोलने वाला कोई नहीं था। फिर भी उसके चेहरे पर हार नहीं, बल्कि एक अजीब सा साहस दिखाई दे रहा था। ऐसा साहस जो तब दिखाई देता है जब कोई व्यक्ति अकेला होकर भी अपने अधिकार की बात कर रहा हो।
कुछ देर बाद उस परिवार के एक सदस्य ने दूसरी महिला को बुलाकर सीट पर बैठा लिया और कहा कि सीट उसी के लिए रोकी गई थी। बहस वहीं समाप्त हो गई।
थोड़ी देर बाद वह महिला अपने बच्चों के साथ अपने स्टेशन पर उतर गई।
उसके जाने के बाद वही लोग कहने लगे, "अगर वह प्यार से बात करती तो हम उसे बैठा देते।"
मैं चुपचाप उनकी बात सुनता रहा और सोचता रहा—
क्या सचमुच वे उसे सीट दे देते?
या फिर यह केवल जीत जाने के बाद कही गई बात थी?
इस प्रश्न का उत्तर शायद कभी नहीं मिलेगा। लेकिन उस दिन की घटना ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया।
जीवन में कई बार हम ऐसी परिस्थितियों में होते हैं जहाँ सामने वाले के पास वह चीज़ होती है जिसकी हमें आवश्यकता होती है। ऐसे समय में हमारा व्यवहार, हमारी भाषा और हमारा धैर्य ही हमारे सबसे बड़े साधन बन जाते हैं।
हिंसा, क्रोध और ज़बरदस्ती से हम कोई वस्तु प्राप्त तो कर सकते हैं, लेकिन उसके साथ कई नए शत्रु भी पैदा हो जाते हैं। इसके विपरीत, संवाद, विनम्रता और धैर्य से प्राप्त की गई वस्तु केवल वस्तु नहीं रहती, वह सम्मान और विश्वास का प्रतीक बन जाती है।
महात्मा गांधी ने अहिंसा को केवल मारपीट न करने तक सीमित नहीं रखा था। उनके लिए अहिंसा का अर्थ था—संवाद, धैर्य और मनुष्य के भीतर की अच्छाई पर विश्वास।
मान लीजिए मेरे पास दो बकरियाँ हैं और किसी बच्चे को उनमें से एक बहुत पसंद आ जाती है।
उसके पास दो रास्ते हैं।
पहला, वह उसे चुरा ले या छीन ले।
दूसरा, वह रोज़ आए, मुझसे मिले, बात करे, मेरा विश्वास जीते और उसे माँगे।
यदि वह पहली राह चुनता है तो मैं उसे खोजूँगा, उससे नाराज़ रहूँगा और अवसर मिलने पर अपनी वस्तु वापस लेने की कोशिश करूँगा।
लेकिन यदि वह दूसरी राह चुनता है, तो संभव है कि एक दिन मैं स्वयं प्रसन्न होकर उसे वह बकरी दे दूँ। उस स्थिति में वह बकरी उसकी हो जाएगी और मेरे मन में उसके प्रति कोई वैर भी नहीं रहेगा।
यही हिंसा और अहिंसा के बीच का सबसे बड़ा अंतर है
हिंसा से प्राप्त वस्तु पर अधिकार तो मिल सकता है, लेकिन स्वीकार्यता नहीं।
अहिंसा से प्राप्त वस्तु पर केवल अधिकार ही नहीं, सम्मान भी मिलता है।
उस दिन ट्रेन में मैंने केवल एक सीट का विवाद नहीं देखा था।
मैंने देखा था कि मनुष्य का व्यवहार परिस्थितियों को कैसे बदल सकता है।
और शायद यही जीवन का एक महत्वपूर्ण सत्य है—
कभी-कभी जीत उस व्यक्ति की नहीं होती जो सबसे ज़ोर से बोलता है, बल्कि उसकी होती है जो सबसे अधिक धैर्य रखता है।
Thankyou
About the Author
Lalit Kumar Rathor is the founder of Lalit Dairies and writes about philosophy, psychology,human behaviour,life lessons,Rajasthan's history, culture, heritage, and geography.