हमारी भी लंच करने की तैयारी थी, लेकिन आज प्रिंसिपल सर ने कहा था कि आज वो लंच में आएंगे, उन्हें हमें भविष्य के बारे में हमारा मार्गदर्शन करना था। मैं पीछे से दो पंक्ति आगे और आगे से तीन पंक्तियों के पीछे बैठा हुआ था। कक्षा में दो गेट, एक आगे और एक पीछे तथा दोनों तरफ दो खिड़कियां बनी हुई थीं। मेरी सीट खिड़की के पास ही थी तो मैं बाहर का दृश्य नहीं देख सकता था, किंतु जब भी बाहर से चिल्लाने की आवाजें आती या लगता कि बाहर देखना चाहिए तो अपनी सीट से उठकर, आगे की ओर झुककर देख लिया करता था। अब कुछ ही समय बाद सर भी आ गए। सफेद रंग की प्लेन शर्ट और काले रंग की पैंट पहने हुए थे, अच्छे से बाल, दाढ़ी सब कुछ एकदम परफेक्ट। उन्हें देखकर कोई भी कह देगा कि ये ही प्रिंसिपल सर होंगे।
सर बोर्ड पर लिखकर बताने लगे कि हम आगे क्या करियर चुन सकते हैं, कितने लोग आगे जा सकते हैं और भी बहुत सी बातें वो कर रहे थे। मैं भी उन्हें ध्यान से अंत तक सुन रहा था। हां, लेकिन बाहर से बच्चों का शोर भी आ रहा था क्योंकि शायद आज छोटी कक्षाओं का अंतिम दिन था तो आज उन्हें लंच में पूरी छुट्टी दे दी गई थी। बच्चे पूल में खेल रहे थे, तैर रहे थे, एक ओर से दूसरी ओर जा रहे थे। मुझे सब साफ तो नहीं दिख रहा था, लेकिन मैं उठकर देखने की कोशिश जरूर कर रहा था। सर की बातें भी दिमाग में चल रही थीं, वो बता रहे थे कि जीवन में कभी यदि किसी काम में असफल हों तो निराश होकर नहीं बैठना है, अपने आप को सीमित नहीं करना है। आप जो चाहें तो सब कुछ कर सकते हैं। सच में मैं सर से बहुत ज्यादा प्रभावित हूं, उनका नेचर भी सपोर्टिव टाइप का है।
मैंने बाहर की तरफ 2-3 मिनट बाद देखा क्योंकि शायद उस टाइम मैं सर को ध्यान से सुन रहा था। जब मैंने बाहर देखा तो मुझे कोई पूल में नीचे की तरफ मुंह किए हुए लेटा हुआ दिखा। पानी भी मटमैला था, शायद आर-पार की स्थिति पानी के कारण नहीं हो पा रही थी। फिर अचानक बहुत तेज शोर होने लगा। सर भी बाहर की तरफ तेज दौड़े, आसपास के बच्चे भी इकट्ठा हो गए थे। सर ने पानी में छलांग लगाई, शायद वो बच्चा पानी में डूब रहा था।
हम सब भी क्लास से बाहर आ गए थे। सर ने उस बच्चे को पानी से बाहर निकाला, आसपास खड़े बच्चों ने उसे ऊपर की ओर खींचा और बरामदे में लेटा दिया। मैं बहुत डर गया था और घबराहट की वजह से दोनों पूल के बीच बने रास्ते पर खड़ा था। मुझे दूसरी तरफ से भी काफी आवाजें आने लगीं, मैं उस तरफ गया, लेकिन वहां तो कुछ बच्चे डूबने का नाटक कर रहे थे, पानी से खेल रहे थे। फिर मैं वापस अपनी कक्षा की तरफ जाने लगा उस बच्चे का हाल देखने के लिए, लेकिन जब मैं वहां पहुंचा तो मैंने देखा कि वो बच्चा जमीन पर सीधा लेटा हुआ था, किसी ने उसका चेहरा छिपाने के लिए उसे हेलमेट पहना दीया था और उसके आसपास कोई नहीं था, सभी उससे कुछ दूरी पर खड़े थे। और बातें कर रहे थे कि बस कुछ देर और होते, तो शायद उसकी जान बच जाती। सर ने बचाने की बहुत कोशिश की थी। अब कुछ देर बाद उस बच्चे के घरवाले भी स्कूल में आ गए थे, लेकिन सब बहुत रो रहे थे, स्कूल के स्टाफ को भला-बुरा भी बोल रहे थे। पुलिस और एम्बुलेंस भी आ गई थी। सर रोते हुए उनसे बात कर रहे थे, उन्हें दिलासा दे रहे थे। मैं ये सब देखकर बहुत ही बेचैन हो रहा था। मैं उस भीड़ के सबसे पीछे की ओर खड़ा था और उन सबकी आवाजें, बातें सुनकर रो रहा था। फिर मैं भीड़ से निकलकर आगे जाने लगा, जैसे-जैसे मैं आगे की ओर जा रहा था, बेचैनी और भी ज्यादा बढ़ रही थी कि अंत में मैं उस बच्चे की लाश के सामने आ गया था। मेरे पास में ही उसकी मां, सर खड़े थे। लेकिन मैं उस पल बिल्कुल सदमे में आ गया था जैसे मैंने ऐसा कुछ देख लिया था जिस पर विश्वास करना बहुत असम्भव था।
मैंने अपनी मां को रोते हुए देखा, आखिर मेरी मां यहां क्यों आई और क्यों रो रही है? मैं एक दम स्तब्ध खड़ा हो गया, मेरे सोचने-समझने की शक्ति पूरी तरह से जा चुकी थी। मैंने हिम्मत की और उस बच्चे की लाश के पास गया, नीचे झुका और उसका हेलमेट सिर से नीचे किया तो देखो कि ये तो मैं खुद ही हूं। वहां खड़े सब लोग मेरे लिए ही रो रहे थे, मेरी मां, सर, दोस्त। फिर अचानक मेरी नींद खुल गई। मैं अपने बिस्तर पर ही कुछ देर लेटा रहा, मेरी दोनों आंखों से पता नहीं क्यों आंसू की बूंदें गिर गईं। फिर मैं बैठ गया और घड़ी में टाइम देखा तो सुबह के 8:15 हो रहे थे। सपने में अपनी मौत देखकर मैं बहुत डर गया था, क्योंकि कितने सारे सपने थे जो मैं पूरा करना चाहता था लेकिन एक ही बार में सब कुछ खत्म। थोड़ी देर तक तो मैं किसी से बात ही नहीं की। फिर बाद में दिमाग में आया कि वह सिर्फ एक सपना था, लेकिन वह अहसास इतना गहरा था कि लगा जैसे पुरानी सारी चीजें खत्म हो गई हैं। अब मुझे लग रहा है कि मुझे अपनी जिंदगी को दोबारा जीने का मौका मिला है।