कागज़ों में मालिक, हकीकत में मज़दूर — महिला किसानों की असली कहानी
कुछ दिन पहले एक रिपोर्ट पढ़ी तो सच कहूं, मन थोड़ा भारी हो गया। IIM अहमदाबाद की एक स्टडी सामने आई है, जिसमें बताया गया है कि एग्री-इंफ्रा फंड के तहत जो सस्ते लोन दिए जा रहे हैं, उनमें ज़्यादातर लोन महिलाओं के नाम पर मंजूर हुए हैं। सुनने में अच्छा लगता है, है ना? लेकिन जब आगे पढ़ा तो असलियत कुछ और ही निकली — इनमें से करीब 71 प्रतिशत प्रोजेक्ट्स का असली कंट्रोल आज भी पुरुषों के हाथ में है।
यानी नाम महिला का, फाइल महिला की, दस्तखत भी शायद महिला के ही होंगे — लेकिन मशीन कौन चलाएगा, पैसा कहां लगेगा, मंडी में सौदा कौन करेगा, बैंक से बात कौन करेगा — यह सब अब भी घर के मर्द ही तय कर रहे हैं। मुझे यह पढ़कर लगा कि हम कागज़ पर बराबरी दिखाने में तो माहिर हो गए हैं, पर असली बराबरी अभी भी बहुत दूर है।
रिपोर्ट में एक बात और चौंकाने वाली है। वेयरहाउस, प्रोसेसिंग यूनिट, सॉर्टिंग-ग्रेडिंग सेंटर जैसे काम, जहां असल में फैसले लिए जाते हैं, वहां स्वीकृत फाइलों में भले ही महिला का नाम हो, पर काम करने वाले ज़्यादातर हाथ पुरुषों के ही हैं। जमीन के कागज़ों में घर की महिला का नाम दर्ज है, लेकिन मशीनरी खरीदना हो, मंडी में व्यापार करना हो, या बैंक से पत्राचार करना हो — यह जिम्मेदारी अब भी पति, बेटे या भाई ही निभा रहे हैं।
मुझे लगता है इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि महिलाओं को इन कामों के लिए ठीक से तैयार ही नहीं किया गया। रिपोर्ट में भी यही सिफारिश की गई है कि सिर्फ लोन देकर छुट्टी मत करो, महिलाओं को मशीनरी चलाना, हिसाब-किताब रखना और मंडी का काम सिखाओ भी। यह बात मुझे सबसे ज़्यादा सही लगी। जब तक व्यावहारिक ट्रेनिंग नहीं मिलेगी, तब तक कागज़ी मालिकाना हक का कोई मतलब नहीं रह जाता।
एक और चीज़ जो ध्यान खींचती है — राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में महिलाओं के नाम पर 8 से 22 प्रतिशत तक ज़्यादा रजिस्ट्रेशन हुए, जबकि पंजाब, यूपी, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में यह आंकड़ा सिर्फ 4 प्रतिशत के आसपास रहा। इससे साफ पता चलता है कि यह सिर्फ नीति की बात नहीं, बल्कि इलाके, समाज और परिवार की सोच पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है।
मेरी नज़र में यह मुद्दा सिर्फ लोन या स्कीम का नहीं है। यह इस बात का भी है कि हम महिला सशक्तिकरण को कैसे नापते हैं। अगर हम सिर्फ आंकड़े देखकर संतुष्ट हो जाएंगे, तो जमीनी हकीकत कभी नहीं बदलेगी। असली बदलाव तब आएगा जब फाइल में नाम के साथ-साथ फैसले लेने का अधिकार भी महिला के हाथ में होगा।
