Lalit Dairies
विचारों और अनुभवों का एक खुला पन्ना
खूबसूरती और बदसूरत का पैमाना: एक गहरी सोच
आज मैं बात करने जा रहा हूँ एक ऐसे विषय पर जिसका आतंक पूरी दुनिया पर ही छाया है। घबराइए मत, मैं यहाँ भ्रष्टाचार की बात नहीं कर रहा हूँ, मैं यहाँ बात करने जा रहा हूँ उस पैमाने की जिसके आधार पर लोग खूबसूरत और बदसूरत में फर्क निकालते हैं। देखिए मेरी मानें तो ये दोनों शब्द कभी अस्तित्व में होने ही नहीं चाहिए थे, क्योंकि आखिर हम कैसे किसी को खूबसूरत और बदसूरत बोल सकते हैं? क्या इसीलिए कि यह चेहरा हमें पसंद नहीं आ रहा है तो इसे बदसूरत बोल दें और हमें अच्छा लग रहा है उसे खूबसूरत बोल दें?
बात भले ही आपको छोटी सी लग रही हो, लेकिन अगर हम इस पर आराम से बैठकर चिंतन करें तो हमें मालूम होगा कि यह उतनी ही गहरी है जितना गहरा इन भ्रष्ट नेताओं का बैंक अकाउंट का बैलेंस हो।
चलो मैं अपने बचपन की ही बात बताता हूँ जब मैं छोटा था, एकदम नया पहली बार स्कूल गया था, तब वहाँ बहुत से बच्चों से मुलाकात हुई। सभी अपने आप में अद्वितीय थे। सबकी शारीरिक बनावट से लेकर सोचने-समझने की शक्ति अलग-अलग थी। यकीन मानिए, ये कहानी सिर्फ मेरी ही नहीं है, हम सब के साथ कभी न कभी ऐसा हुआ ही है।
और जो बच्चे थोड़े काले, जिसे हम सांवला बोलते या अन्य बच्चों की स्किन कलर ज्यादा Dark Skin वाले होते थे, उसे खुद टीचर्स ही कालु, काली, कल्लू आदि शब्दों से संबोधित करते थे और फिर ऐसा सुन कर पूरी क्लास हंसने लग जाती थी। और वो लड़का या लड़की जिसे कालु, काली कहा गया है, एक हंसी का पात्र बन जाते थे। हालाँकि, समय के साथ-साथ और समाज के चलते लोगों ने इसे अपना भी लिया।
तो आखिर उन अध्यापकों को ये बात किसने सिखाई कि बच्चे को गोरा और काला कहकर बुलाना है? या फिर जो क्लास में और बच्चे थे, उन्हें तब ही हंसी क्यों आई जब टीचर ने कालु, काली कहा? उन्हें गोरे बोलने पर हंसी क्यों नहीं आई? क्या गोरा होना वाकई में सम्मान का प्रतीक है और काला होना केवल उपहास मात्र?
और फिर जैसे-जैसे ये बच्चे बड़े होते चले गए ये मानने लगे की जो गोरा है वो ही खूबसूरत है और जो काला है वो बदसूरत है। और ये छोटे बच्चे जो बड़े हुए, और कोई नहीं हम और आप ही हैं।
ये सब कम था की मार्केट में ऐसे प्रोडक्ट आ गए जो दावा करते हैं कि हम आपकी Dark Skin को white कर देंगे, आपको काले से गोरा बना देंगे। अरे भाई! आखिर गोरा क्यों होना है? क्या गोरा होना वाकई में सम्मान का प्रतीक है?
ताज्जुब की बात तो ये है कि इन कम्पनियों के प्रोडक्ट आज भी धड़ल्ले से बिक रहे हैं। हालाँकि, मैं मानता हूँ कि समय के साथ लोग समझने लगे हैं। कई देशों में इसके खिलाफ आंदोलन हुए जिसके कारण बदलाव दिखा हो। लेकिन, मैं यहाँ बात कर रहा हूँ भारत देश की, मेरे अपने देश की, जहाँ शायद आज भी रूढ़िवादिता लोगों के घरों में अलग से कमरा बनाकर रहती है, वे इससे अलग होना ही नहीं चाहते।
आखिर मुझे ये सब लिखने की जरूरत महसूस पड़ रही है, क्योंकि भेदभाव चमड़ी के आधार पर आज भी है। हम चाहे कितना ही नकार दें लेकिन वो है। मर्दों में से 70% अभी भी ऐसे होंगे जो हमेशा सफेद चमड़ी वाली औरत से ही शादी करना चाहें, वो भी समाज के दबाव में आकर, चाहे उनकी खुद की इच्छा नहीं हो फिर भी।
स्कूलों में आज भी टीचर भूरा, गोरी, काली, कल्लू जैसे संबोधनों का इस्तेमाल कर रहे हैं। खैर, समय के साथ-साथ तो इसमें कमी आएगी ही, लेकिन जब हम सोचेंगे कि हमने भी कभी किसी की चमड़ी काली होने या जैसी हमें पसंद नहीं वैसी होने पर उसके साथ भेदभाव किया था तो हमें अपने आप बहुत शर्म आएगी।

